शिक्षा की तैयारी प्राथमिक स्तर पर

पूर्व प्राथमिक व प्राथमिक स्तर की नींव

अभिव्यक्तिहिंदी लेखप्राथमिक शिक्षा

✍️ लेखिका: Dr. Poonam Mudaliar

कक्षा 1 व 2 के बच्चों की साक्षरता व शिक्षा की बात आप सभी से साझा करना चाहती हूँ। मेरा भ्रम है या सच्चाई।

बच्चे आज कक्षा तीसरी तक पहुँचकर भी पढ़ नहीं पाते, लिख नहीं पा रहे हैं।

समस्या क्या है?

  • पढ़ने की समस्या
  • अक्षर पहचानने की समस्या
  • लिख तो लेते हैं पर अपने द्वारा लिखा नहीं पढ़ पाते।

अभी आप कक्षा 5 या 9वीं के बच्चों को देखेंगे, तो पता चलेगा कि वे जो भी पढ़ रहे हैं, उसे लिखने में दिक्कत आती है। कुछ समय बीत जाने पर वे भूल भी जाते हैं।

यह केवल सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की समस्या नहीं है, बल्कि निजी स्कूलों की भी समस्या है। शिक्षिकाएँ मेहनत कर रही हैं, पालक (Parents) भी और बच्चे भी मेहनत कर रहे हैं। पर समस्या जहाँ थी, वहीं की वहीं बनी हुई है।

आज कक्षा में बच्चे सीखने की समस्या (Learning Difficulties) से जूझ रहे हैं। वे विशेष बालकों की श्रेणी में नहीं आते। सामान्य कक्षाओं में पढ़ते हैं, लेकिन शुरुआती दौर में समस्या न पहचान पाने के कारण वह बढ़ती जाती है।



राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और उसका उद्देश्य

एक और दिक्कत यह है कि सब NEP की बात करते हैं और उसे लागू करना चाहते हैं। NEP बच्चों की सुविधा के लिए बनाई गई है, न कि इसे डराने का नियम बनाने के लिए। यह पालकों व बच्चों की सीखने की सुविधा के लिए तैयार की गई है।

NEP के नियम लागू करना जितना आवश्यक है, उतना ही उसके मूल उद्देश्य व भावना को समझकर उसके अनुसार क्रियाकलाप लागू करना भी आवश्यक है। यदि आपने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 पढ़ी है, तो उसके क्रियान्वयन को आसानी से समझ सकते हैं।

शिक्षा में सुधार लाना जरूरी है। इसके लिए नियम भी जरूरी हैं और भावना भी। इसे ऐसे समझें जैसे हम बच्चों को अनुशासन सिखाना चाहते हैं और साथ में उनके नैतिक मूल्यों व भावात्मक गुणों का भी विकास करना चाहते हैं।



खेल द्वारा सीखना और गतिविधियों का उद्देश्य

अभी Play Way Method से पढ़ाना है, तो play के नाम पर दो अलग-अलग खेल हो जाते हैं। Activity हो जाती है, किन्तु उसका उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो पाता और कई बार अधिक उद्देश्य पूरे करने के प्रयास में गतिविधि का मूल उद्देश्य खो जाता है।

स्कूल में मेहनत हो रही है। यह एक ऐसा कारण है जिससे सिखाने की जल्दबाजी में बच्चे पीछे छूट जाते हैं। वैसे सिखाना गलत शब्द है—बच्चों के सीखने में जल्दबाजी कहना चाहिए।

कक्षा 1 में आने तक बच्चे को सब आ जाना चाहिए, नहीं तो यह खाई बढ़ जाएगी—ऐसी अपेक्षा भी बच्चों पर दबाव बढ़ा सकती है।



पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की तैयारी

नर्सरी में अक्षर-ज्ञान से गिनती शुरू होती है। ठीक है, पर बच्चों को मौखिक अभ्यास और बोलने के अवसर भी मिलने चाहिए। A बोलने के पहले A लिखने पर बल दिया जाता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति बच्चों को उनकी भाषा (मातृभाषा) में बोलने का अवसर देती है। यह खेल द्वारा सीखने, शारीरिक विकास और मानसिक विकास पर जोर देती है।

कक्षा 1 व 2 शिक्षा की पूर्व तैयारी हैं। कक्षा 1 में छह वर्ष की उम्र के बच्चों पर मानसिक दबाव नहीं पड़ना चाहिए।

ढाई वर्ष के बाद पूर्व-प्राथमिक (Pre-Primary) बच्चों को विद्यालय से परिचित कराना तथा आगे की कक्षा के लिए तैयारी करना उद्देश्य है, किन्तु कहीं-कहीं यह युद्ध पर जाने की तैयारी जैसा बन जाता है। दौड़ इतनी तेज है कि कई बच्चे पीछे छूट रहे हैं, कारण कुछ भी हो।



ये समस्याएँ क्यों आ रही हैं?

  1. पहले के बच्चे कक्षा 2, 3, 4 और 5 में हैं, जिन्होंने कोरोना की त्रासदी झेली और अचानक से दो साल आगे बढ़ गए।
  2. ये बच्चे अपनी बुनियादी शिक्षा के कुछ चरण पार कर गए या यूँ कह लें कि उन्हें एक साथ सब मिल गया। पास तो हो गए, किन्तु उस स्तर की तैयारी नहीं हो पाई।
  3. अभी जो बच्चे नर्सरी, के.जी.-1 व 2 में हैं, वे कक्षा 1 व 2 की तैयारी करते हैं और करना भी चाहिए। लेकिन यह तैयारी पढ़ने-लिखने की बुनियाद मजबूत करने की होनी चाहिए। ऐसा समझ लिया गया कि कक्षा 1 व 2 तक बिना रुके लिखना व पढ़ना आ जाए। इससे प्रारम्भिक स्तर पर शिक्षा में जल्दबाजी होती है।
  4. NEP ने लक्ष्य व सीखने के प्रतिफल (Learning Outcomes) निर्धारित किए हैं, जिनका अनुसरण स्कूल करते हैं। केवल प्रतिफल (Outcome) पर ध्यान देने से प्रक्रिया (Process) की अवहेलना हो सकती है। जैसे—बोलना, सुनना, पढ़ना और लिखना सीखने की प्रक्रिया को उलटे क्रम में या भ्रमित ढंग से लागू करना।


सीखने की प्रक्रिया और बच्चों की भावनाएँ

यदि आप बारीकी से देखेंगे, तो सारे नियम तो आ रहे हैं, किन्तु यह प्रक्रिया भावविहीन हो सकती है।

सभी बच्चों की सीखने की गति व प्रक्रिया अलग होती है। उन्हें अपनी भावना व्यक्त करने का अवसर भी मिलना चाहिए।



विचार करने की बात

हो सकता है आप मेरे विचार से सहमत न हों, परन्तु विचार करने की बात यह है कि यदि पालक, शिक्षक व बच्चे भरपूर मेहनत कर रहे हैं, तो सफलता क्यों नहीं मिल रही है?



लेखिका के बारे में

Krishna Kumar - Educator and Founder of Saraswat Academy

Dr. Poonam Mudaliar
Teacher Educator, Career Counsellor, and Digital Content Creator

Dr. Poonam Mudaliar is a Teacher Educator, Career Counsellor, and Digital Content Creator based in Bhilai, Chhattisgarh. She is the Founder of Rajee Education – Career and Academic Counselling Centre, where she supports students in making informed academic and career decisions.

Through scientific psychometric assessments, personalised one-to-one counselling, and academic mentoring, she has been helping students from Classes 10 to 12 explore suitable career pathways and plan their futures with confidence.

Academic and Professional Background Dr. Mudaliar holds a Ph.D. in Education, M.Phil., and M.Ed. from RIE Bhopal, along with a B.Ed. She brings extensive experience to the education sector, including: Over 8 years of experience as an Assistant Professor in B.Ed. colleges. 2.5 years of experience as an Academic Coordinator. Consultancy experience with ICICI Foundation and SCERT/DIET.

Educational Mission and Digital Initiatives
Dr. Mudaliar is committed to making quality career guidance accessible to every student and contributing to innovation in education. Through her YouTube channel, Learn with Guru’s, and her blog, Teacher A Breath, she shares free educational resources and insights for students, parents, and teachers. Her work aligns with the educational vision of Saraswat Academy, which provides learning resources and academic support for school students. Through knowledge-sharing and educational collaboration, she aims to help learners make informed choices and build a strong foundation for lifelong learning.

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