प्रश्न: छात्राः मिलित्वा पृथक्-पृथक् पञ्चानां छात्राणां लघुसमूहान् निर्माय यति-गति-लयपूर्वकं गीतगानस्य अभ्यासं करिष्यन्ति।
उत्तर: छात्राः पञ्च-पञ्च-सदस्यानां लघुसमूहान् निर्माय यति-गति-लयपूर्वकं गीतगानस्य अभ्यासं करिष्यन्ति। शिक्षकस्य मार्गदर्शनेन शुद्धोच्चारणपूर्वकं सामूहिकरूपेण गीतगानस्य अभ्यासः करणीयः।
अभ्यासः 2 — एकपदेन उत्तरं लिखत
| प्रश्नः | उत्तरम् |
| यथा — ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं किम्? | संस्कृतम् |
| (क) संस्कृतं कस्याः साधकम्? | भारतीयैकतायाः |
| (ख) सर्वदा संस्कृतं कस्य सन्दोहदम्? | आनन्दस्य |
| (ग) संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम्? | सत्पथस्य |
| (घ) संस्कृतं कासां परिष्कारकम्? | सर्ववाणीानाम् |
| (ङ) कस्य विस्तारकं संस्कृतम्? | विश्वबन्धुत्वस्य |
अभ्यासः 3 — पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत
| प्रश्नः | उत्तरम् |
| (क) सर्वतः कस्याः संस्थापकं संस्कृतम्? | संस्कृतं सर्वतः शान्तेः संस्थापकम् अस्ति। |
| (ख) कीदृशं व्रतं संस्कृतम्? | संस्कृतं त्यागसन्तोषसेवारूपं व्रतम् अस्ति। |
| (ग) कयोः सम्मेलनं संस्कृतम्? | संस्कृतं ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनम् अस्ति। |
| (घ) संस्कृतं कस्य चमत्कारकम्? | संस्कृतं विश्वचेतसः चमत्कारकम् अस्ति। |
| (ङ) केषां यशः स्मारकं संस्कृतम्? | संस्कृतं पूर्वजानां यशः स्मारकम् अस्ति। |
अभ्यासः 4 — रिक्तस्थानानि पूरयन्तु
| क्रमः | पूर्ण उत्तरम् |
| यथा | सर्वभूतैकता-कारकं संस्कृतम्। |
| (क) | भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम्। |
| (ख) | ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं संस्कृतम्। |
| (ग) | सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं संस्कृतम्। |
| (घ) | कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्। |
| (ङ) | सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्। |
| (च) | शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम्। |
अभ्यासः 5 — मञ्जूषायाः पदानि उपयुज्य षड् वाक्यानि रचयत
मञ्जूषा: वाणीपरिष्कारिका, एकता, सर्वतः, सेवा, सुन्दरम्, पूर्वजानाम्, सत्पथे प्रेरयितुम्, विश्वकल्याणाय, त्यागस्य, सन्तोषस्य, विश्वबन्धुत्वविस्तारकम्
| क्रमः | वाक्यम् |
| (क) | संस्कृतभाषा वाणीपरिष्कारिका भवति। |
| (ख) | संस्कृतं भारतीयैकतायाः साधकम् अस्ति। |
| (ग) | संस्कृतं सर्वतः शान्तिसंस्थापकम् अस्ति। |
| (घ) | संस्कृतं विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् अस्ति। |
| (ङ) | संस्कृतं सत्पथे प्रेरयितुम् समर्थम् अस्ति। |
| (च) | संस्कृतं विश्वकल्याणाय त्यागस्य सन्तोषस्य च भावनां प्रेरयति। |
अभ्यासः 6 — समस्तपदानां विग्रहं कुरुत
| समस्तपदम् | विग्रहः |
| यथा — भारतीयैकतासाधकम् | भारतीयैकतायाः साधकम् |
| (क) ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम् | ज्ञानपुञ्जस्य प्रभां दर्शकम् |
| (ख) सर्ववाणीपरिष्कारकम् | सर्वासां वाणीानां परिष्कारकम् |
| (ग) विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् | विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम् |
| (घ) सर्वभूतैकताकारकम् | सर्वेषां भूतानाम् एकताकारकम् |
| (ङ) शान्तिसंस्थापकम् | शान्तेः संस्थापकम् |
| (च) ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम् | ज्ञानस्य विज्ञानस्य च सम्मेलनम् |
अभ्यासः 7 — पर्यायपदानि चित्वा रिक्तस्थाने लिखत
मञ्जूषा: उल्लासः, किरणः, जगत्, अनुपमा, तेजोराशयः, मानम्
| प्रश्नः | उत्तरम् |
| (क) विद्वांसः ........................ भवन्ति। | तेजोराशयः |
| (ख) सूर्यस्य ........................ सर्वेषां प्राणिनां कृते हितकरः भवति। | किरणः |
| (ग) ईश्वरं स्मृत्वा ........................ उपजायते। | उल्लासः |
| (घ) विद्यायाः ........................ अजरं भवति। | मानम् |
| (ङ) प्रकृतेः शोभा ........................ विद्यते। | अनुपमा |
| (च) यत्र ........................ एकनीडं भवति। | जगत् |
अभ्यासः 8 — मेलनं कुरुत
| क्रमः | पदसमूहः | सही मिलान |
| (क) | भारतीयैकतायाः | साधकम् — २ |
| (ख) | सत्पथे | प्रेरणादायकम् — ४ |
| (ग) | त्यागसन्तोषसेवारूपम् | व्रतम् — ५ |
| (घ) | ज्ञानपुञ्जप्रभायाः | दर्शकम् — ३ |
| (ङ) | विश्वबन्धुत्वस्य | विस्तारकम् — १ |
कविकाव्यपरिचयः
इस गीत के रचयिता पण्डित वासुदेव-शास्त्रि-द्विवेदीमहाभाग हैं। वे वाराणसी में स्थित सार्वभौम संस्कृतप्रचारकार्यालय के संस्थापक थे। उन्होंने सरल संस्कृत में अनेक ग्रन्थों की रचना की तथा संस्कृत-प्रचार के लिए साहित्य प्रकाशित किया। परमार्थसुधा नामक संस्कृत पत्रिका का भी उन्होंने सम्पादन किया। पाठ में उनकी प्रसिद्ध कृतियों के रूप में सरभारतीसन्देशः, स्वर्गीयसंस्कृतकविसम्मेलनम्, भोजराज्ये संस्कृतसाम्राज्यम् और कौत्सस्य गुरुदक्षिणा आदि का उल्लेख है।
यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान् — प्रश्न 1
विषय — “संस्कृताधारिता भारतीयैकता”
आदर्श भाषण:
आदरणीयाः शिक्षकाः, प्रियाः सहपाठिनः च। अद्य अहं “संस्कृताधारिता भारतीयैकता” इति विषयम् अधिकृत्य स्वविचारान् प्रस्तुतयामि। संस्कृतभाषा भारतदेशस्य प्राचीनसमृद्धभाषासु अन्यतमा अस्ति। अस्याः भाषायाः माध्यमेन भारतस्य ज्ञानपरम्परा, संस्कृतिः, दर्शनम् तथा साहित्यं सुरक्षितम् अस्ति।
संस्कृतं भारतीयानाम् एकतां साधयति तथा भारतीयत्वस्य भावनां दृढं करोति। भारतस्य विभिन्नभाषासु संस्कृतस्य बहवः शब्दाः प्रयुज्यन्ते। अतः संस्कृतं भारतीयभाषाणां मध्ये एकतायाः सेतुरिव कार्यं करोति।
संस्कृताध्ययनेन मनुष्यस्य मनसः संस्कारः भवति, वाणी परिष्क्रियते, मनुष्यः सत्पथे प्रेरितः भवति तथा सद्गुणानां विकासः भवति। संस्कृतं विश्वबन्धुत्वस्य, सर्वभूतैकतायाः तथा विश्वशान्तेः भावनां वर्धयति।
अतः संस्कृतस्य अध्ययनं केवलं भाषाज्ञानं न, अपितु भारतीयसंस्कृतेः तथा भारतीयैकतायाः संरक्षणस्य महत्त्वपूर्णं साधनम् अस्ति। वयं सर्वे संस्कृतं पठेम, संस्कृतं वदेम, संस्कृतस्य गौरवं च वर्धयेम।
धन्यवादाः।
यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान् — प्रश्न 2
प्रश्न: विश्वबन्धुत्वभावनायाः विकासाय के मार्गाः अवलम्बनीयाः?
उत्तर: विश्वबन्धुत्वभावनायाः विकासाय सर्वेषां मानवानाṁ प्रति समानभावः स्थापनीयः। जाति, भाषा, देशादिभेदान् त्यक्त्वा सर्वेषां सम्मानः करणीयः। परस्परं प्रेम, सहयोगः, सहिष्णुता, करुणा, अहिंसा तथा सेवाभावः वर्धनीयः। सर्वेषां प्राणिनां प्रति मैत्रीभावः स्थापनीयः। विश्वशान्तिः, मानवकल्याणं तथा परस्परसहयोगः अस्माकं प्रमुखाः लक्ष्याः भवेयुः।
स्वाध्याय — पञ्चशीलं किम्?
बौद्धधर्मे सदाचारस्य परिपालनाय पञ्च शीलानि सन्ति। पाठ में इनके नाम निम्नलिखित हैं।
| क्रमः | पञ्चशीलम् | सरल अर्थ |
| १ | अस्तेयम् | चोरी न करना। |
| २ | अहिंसा | हिंसा न करना। |
| ३ | ब्रह्मचर्यम् | संयमपूर्वक सदाचार का पालन करना। |
| ४ | सत्यम् | सत्य बोलना। |
| ५ | मादकद्रव्याणां परिहारः | मादक द्रव्यों का त्याग करना। |
पाठ के प्रमुख पद्यांश — त्वरित पुनरावृत्ति
| क्रमः | पद्यांश | मुख्य भाव |
| १ | भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्। | संस्कृत भारतीय एकता की साधक है। |
| २ | सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं संस्कृतम्। | संस्कृत मन का संस्कार करती है। |
| ३ | विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम्। | संस्कृत विश्वबन्धुत्व को बढ़ाती है। |
| ४ | सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम्। | सभी प्राणियों की एकता का भाव विकसित करती है। |
| ५ | ज्ञानविज्ञानसम्मेलनं संस्कृतम्। | ज्ञान और विज्ञान के समन्वय का माध्यम है। |
| ६ | कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्। | कर्म, ज्ञान और भक्ति का मार्ग बताती है। |
| ७ | सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्। | संस्कृत सत्य, कल्याण और सौन्दर्य से जुड़ी है। |
| ८ | शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम्। | संस्कृत के शब्द-सौन्दर्य को दर्शाता है। |
पाठ का मुख्य संदेश
संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति और परम्परा की महत्त्वपूर्ण संवाहिका है। यह भारतीय एकता, सद्गुण, विश्वबन्धुत्व और शान्ति की भावना को विकसित करने का संदेश देती है। इसी कारण पाठ में संस्कृत को “सत्यं शिवं सुन्दरम्” कहा गया है।