HINDI CLASS- 8: मल्हार
CHAPTER-9:(आदमी का अनुपात)
आदमी का अनुपात – मेरी समझ से
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (*) बनाइए।
1. कविता के अनुसार ब्रह्मांड में मानव का स्थान कैसा है?
* ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म
2. कविता में मुख्य रूप से किन दो वस्तुओं के अनुपात को दिखाया गया है?
* मानव और ब्रह्मांड
3. कविता के अनुसार मानव किन भावों और कार्यों में लिप्त रहता है?
* ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा में
4. कविता के अनुसार मानव का सबसे बड़ा दोष क्या है?
* वह अपने छोटेपन को भूल अहंकारी हो जाता है।
(ख) आपने ये उत्तर क्यों चुने?
1. कवि ने पृथ्वी, नक्षत्रों और ब्रह्मांड की विशालता का वर्णन करके बताया है कि मानव ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत छोटा और सीमित है।
2. पूरी कविता में मानव की लघुता और ब्रह्मांड की विराटता की तुलना की गई है। इसलिए मुख्य अनुपात मानव और ब्रह्मांड का है।
3. कविता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मनुष्य ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों में उलझा रहता है।
4. मानव अपनी वास्तविक स्थिति को भूलकर स्वयं को दूसरों का स्वामी समझने लगता है। यही उसका सबसे बड़ा दोष है।
आदमी का अनुपात – मिलकर करें मिलान
स्तंभ 1 का स्तंभ 2 से मिलान
1. संख्यातीत शंख सी दीवारें
→ मनुष्य द्वारा खींची गई कृत्रिम सीमाएँ
2. पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक
→ पृथ्वी की अल्पता और अनोखेपन की ओर संकेत
3. ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा
→ मनुष्य की नकारात्मक भावनाएँ
4. दो व्यक्ति कमरे में / कमरे से छोटे
→ आदमी के संकुचित होने का प्रतीक
5. परिधि नभ गंगा की
→ ब्रह्मांड की विशालता का प्रतीक
6. एक कमरे में दो दुनिया रचाता
→ सीमित स्थान में भी अलगाव की प्रवृत्ति
आदमी का अनुपात – पंक्तियों पर चर्चा
(क) “अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही।”
इन पंक्तियों में कवि ने ब्रह्मांड की विशालता और पृथ्वी की लघुता का चित्रण किया है। अनगिनत नक्षत्रों और ग्रहों के बीच पृथ्वी एक बहुत छोटा ग्रह है। इसके बावजूद यह जीवन से भरपूर और अद्वितीय है। कवि हमें यह समझाना चाहते हैं कि ब्रह्मांड की विशालता के सामने हमें विनम्र रहना चाहिए और अपने महत्व को सही दृष्टि से समझना चाहिए।
(ख) “संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है / अपने को दूजे का स्वामी बताता है।”
इन पंक्तियों में कवि मनुष्य की संकीर्ण सोच और अहंकार की आलोचना करते हैं। मनुष्य जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और देश के आधार पर अनेक कृत्रिम दीवारें खड़ी कर लेता है। वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और उन पर अधिकार जमाने का प्रयास करता है। कवि इस प्रवृत्ति को मानवता के लिए हानिकारक मानते हैं।
(ग) “देशों की कौन कहे / एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है।”
कवि कहना चाहते हैं कि मनुष्य केवल देशों और समाजों में ही नहीं, बल्कि छोटे-से कमरे में भी विभाजन और अलगाव पैदा कर लेता है। वह अपने स्वार्थ, विचारों और अहंकार के कारण लोगों के बीच दूरी बना लेता है। यह पंक्ति मनुष्य की विभाजनकारी मानसिकता पर व्यंग्य करती है।
आदमी का अनुपात – सोच-विचार के लिए
(क) कविता के अनुसार मानव किन कारणों से स्वयं को सीमाओं में बाँधता चला जाता है?
मानव ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास जैसी नकारात्मक भावनाओं के कारण स्वयं को सीमाओं में बाँध लेता है। वह जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और राष्ट्र के आधार पर विभाजन पैदा करता है। इन सीमाओं के कारण उसका दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है और वह मानवता की व्यापक भावना से दूर हो जाता है।
(ख) यदि आपको इस कविता की एक पंक्ति दीवार पर लिखनी हो, जो आपको प्रतिदिन प्रेरित करे, तो आप कौन-सी पंक्ति चुनेंगे और क्यों?
मैं “यह है अनुपात आदमी का विराट से” पंक्ति चुनूँगा। यह पंक्ति मुझे प्रतिदिन विनम्र रहने और अपनी वास्तविक स्थिति को समझने की प्रेरणा देती है। इससे यह स्मरण रहता है कि ब्रह्मांड की विशालता के सामने मनुष्य बहुत छोटा है, इसलिए उसे अहंकार नहीं करना चाहिए।
(ग) कवि ने मानव की सीमाओं और कमियों की ओर ध्यान दिलाया है, लेकिन कहीं भी क्रोध नहीं दिखाया। आपको इस कविता का भाव कैसा लगा— व्यंग्य, करुणा, चिंता या कुछ और? क्यों?
मुझे इस कविता का भाव मुख्य रूप से चिंता और व्यंग्य का मिश्रण लगता है। कवि मानव की कमजोरियों को उजागर करते हैं, परंतु उनका उद्देश्य आलोचना करना नहीं बल्कि उसे सही दिशा दिखाना है। कविता हमें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है।
(घ) आपके अनुसार ‘दीवारें उठाना’ केवल ईंट-पत्थर से जुड़ा काम है या कुछ और भी हो सकता है?
मेरे अनुसार ‘दीवारें उठाना’ केवल ईंट-पत्थर की दीवारें बनाना नहीं है। यह मनुष्यों के बीच पैदा होने वाले भेदभाव, घृणा, अहंकार, जातीयता, धार्मिक कट्टरता और मानसिक दूरी का भी प्रतीक है। जब लोग एक-दूसरे को अलग समझते हैं, तब वे अदृश्य दीवारें खड़ी कर देते हैं।
(ङ) मानवता के विकास में सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ और घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से अधिक प्रभावी हैं। उदाहरण देकर समझाइए।
सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं। उदाहरण के लिए प्राकृतिक आपदाओं के समय लोग मिलकर एक-दूसरे की सहायता करते हैं। इससे समाज में एकता और विश्वास बढ़ता है। इसके विपरीत ईर्ष्या, स्वार्थ और घृणा समाज में संघर्ष और विभाजन उत्पन्न करती हैं। इसलिए सकारात्मक प्रवृत्तियाँ मानवता के विकास के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं।