HINDI CLASS- 8: मल्हार
CHAPTER-5: (कबीर के दोहे)
कबीर के दोहे – मेरी समझ से
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (*) बनाइए।
1. “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय” इस दोहे में किसके विषय में बताया गया है?
* गुरु का महत्व
* ज्ञान का महत्व
2. “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप” इस दोहे का मूल संदेश क्या है?
* हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।
3. “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर” यह दोहा किस जीवन-कौशल पर बल देता है?
* दूसरों के काम आना
* सभी के प्रति उदार रहना
4. “ऐसी बानी बोलिए...” दोहे के अनुसार मधुर वाणी बोलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
* दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है।
5. “साँच बराबर तप नहीं...” दोहे से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
* सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है।
* सत्य महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है।
6. “निंदक नियरे राखिए...” में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है?
* आलोचकों को पास रखना चाहिए।
7. “साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय” में ‘सूप’ किसका प्रतीक है?
* विवेक और सूझ-बूझ का
(ख) आपने ये उत्तर क्यों चुने?
1. इस दोहे में गुरु को ईश्वर तक पहुँचाने वाला मार्गदर्शक बताया गया है। गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
2. कबीरदास जी हर कार्य में संतुलन रखने की शिक्षा देते हैं। किसी भी बात की अति हानिकारक होती है।
3. खजूर का पेड़ ऊँचा तो होता है, पर राहगीरों को छाया नहीं देता। इसलिए केवल बड़ा होना पर्याप्त नहीं, बल्कि दूसरों के लिए उपयोगी होना भी आवश्यक है।
4. मधुर वाणी सुनने वाले और बोलने वाले दोनों को सुख एवं शांति प्रदान करती है।
5. सत्य का पालन करना सबसे बड़ी साधना है। सत्य मनुष्य के जीवन को उज्ज्वल और पवित्र बनाता है।
6. आलोचक हमारी कमियों को बताकर हमें सुधारने का अवसर देते हैं। इसलिए उन्हें अपने पास रखना चाहिए।
7. सूप अनाज के उपयोगी भाग को रखकर बेकार चीजों को अलग कर देता है। इसी प्रकार विवेकशील व्यक्ति अच्छी बातों को ग्रहण करता है।
कबीर के दोहे – मिलकर करें मिलान
(क) स्तंभ 1 का स्तंभ 2 से मिलान
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
→ गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करता है।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
→ जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
→ हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
→ आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए।
5. साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
→ विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
→ मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।
7. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
→ सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।
8. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
→ बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।
(ख) दोहों की पंक्तियों का मिलान
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
→ बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
→ अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
→ औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
→ बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।
5. साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
→ सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
→ जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।
7. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
→ पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
8. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
→ जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
कबीर के दोहे – पंक्तियों पर चर्चा
(क) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥”
इस दोहे में कबीरदास जी ने मन की तुलना पक्षी से की है। मन बहुत चंचल होता है और जहाँ इच्छा होती है वहाँ पहुँच जाता है। मनुष्य जिस प्रकार की संगति करता है, उसका प्रभाव उसके विचारों, व्यवहार और चरित्र पर पड़ता है। अच्छी संगति व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाती है, जबकि बुरी संगति उसे गलत मार्ग पर ले जाती है। इसलिए सदैव अच्छे लोगों की संगति करनी चाहिए।
(ख) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥”
कबीरदास जी के अनुसार सत्य से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है। जो व्यक्ति सत्य का पालन करता है, उसका हृदय पवित्र और निर्मल रहता है। ऐसे व्यक्ति के हृदय में स्वयं ईश्वर का वास होता है। यह दोहा हमें जीवन में सत्यनिष्ठ और ईमानदार बनने की प्रेरणा देता है।
कबीर के दोहे – सोच-विचार के लिए
(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े...” में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर स्थान दिया गया है। क्या आप इससे सहमत हैं?
हाँ, मैं इससे सहमत हूँ। गुरु ही वह व्यक्ति होता है जो हमें ज्ञान प्रदान करता है और सही मार्ग दिखाता है। गुरु के मार्गदर्शन से ही हम ईश्वर, सत्य और जीवन के वास्तविक उद्देश्यों को समझ पाते हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति में गुरु को अत्यंत सम्माननीय स्थान दिया गया है। हालांकि ईश्वर सर्वोच्च हैं, परंतु ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग गुरु ही दिखाते हैं।
(ख) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर...” के अनुसार बड़े या संपन्न होने के साथ मनुष्य में कौन-कौन सी विशेषताएँ होनी चाहिए?
केवल बड़ा, शक्तिशाली या संपन्न होना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य में विनम्रता, उदारता, दया, सहानुभूति, सेवा-भाव और परोपकार की भावना भी होनी चाहिए। जो व्यक्ति अपनी क्षमता और संसाधनों का उपयोग दूसरों की सहायता के लिए करता है, वही वास्तव में महान कहलाता है। समाज के लिए उपयोगी बनना ही सच्ची महानता है।
(ग) “ऐसी बानी बोलिए...” क्या शब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही पड़ता है?
नहीं, शब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही नहीं, बल्कि स्वयं पर भी पड़ता है। मधुर और सकारात्मक शब्द मन में शांति और प्रसन्नता उत्पन्न करते हैं, जबकि कटु शब्द तनाव और क्रोध बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, जब हम किसी को प्रोत्साहित करते हैं तो सामने वाला भी प्रसन्न होता है और हमें भी संतोष मिलता है। इसलिए सदैव मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए।
(घ) “जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥” हमारे विचारों और कार्यों पर संगति का क्या प्रभाव पड़ता है?
संगति का हमारे व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अच्छे मित्र और अच्छे लोग हमें अनुशासन, परिश्रम, ईमानदारी और सकारात्मक सोच की प्रेरणा देते हैं। इसके विपरीत बुरी संगति हमें गलत आदतों और बुरे कार्यों की ओर ले जा सकती है। उदाहरण के लिए, मेहनती विद्यार्थियों की संगति में रहने वाला छात्र पढ़ाई के प्रति गंभीर बनता है, जबकि आलसी साथियों की संगति उसका ध्यान भटका सकती है।